व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र और शत्रु उसका मन है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

बुरे विचारों से मन को बचाना कठिन, सकारात्मक चिंतन से मानसिक व भावनात्मक हल्कापन संभव
सोनकच्छ। पुष्पगिरी तीर्थ पर परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। हाल ही में पर्युषण महापर्व भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया।
सोमवार सुबह पूजा-अर्चना के बाद उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना मन ही है। मन को बुरे विचारों से बचाना आसान नहीं है, क्योंकि मन में अनचाहे और नकारात्मक विचार बहुत तेजी से आते हैं। ऐसे विचारों पर नियंत्रण रखते हुए मन को सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि मन में आने वाला प्रत्येक विचार सत्य नहीं होता और न ही हर विचार व्यक्ति के चरित्र को परिभाषित करता है। कई बार मन में ऐसे विचार आते हैं, जिनका कोई गहरा अर्थ नहीं होता। केवल किसी विचार के मन में आने मात्र से व्यक्ति गलत नहीं हो जाता। हमारी चेतना की स्वीकृति के बिना किसी विचार में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह हमें गलत कार्य करने के लिए मजबूर कर सके।
उन्होंने कहा कि अपने अवचेतन मन को समझने और उसे सकारात्मक दिशा देने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। इससे मानसिक एवं भावनात्मक रूप से हल्कापन महसूस होता है। व्यक्ति को अपने भीतर उठने वाले विचारों को समझकर अच्छे विचारों, अच्छे संस्कारों और सकारात्मक भावनाओं को स्थान देना चाहिए।
मन की सच्चाई आंखों में दिखाई देती है
आचार्यश्री ने कहा कि इंसान का मुंह भले ही कुछ भी बोल दे, लेकिन उसका मन और उसकी आंखें अक्सर सच्चाई व्यक्त कर देती हैं। आंखें आत्मा की खिड़की हैं। उनकी अपनी भाषा और अभिव्यक्ति होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के भीतर की भावनाएं कई बार उसकी आंखों के माध्यम से सहज रूप से सामने आ जाती हैं।
उन्होंने गुरु भक्तों से कहा कि जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, मन को नकारात्मकता में उलझाने के बजाय उसे सकारात्मक चिंतन की ओर ले जाना चाहिए। मन में अच्छे विचारों और अच्छे एहसासों को जन्म देते रहना चाहिए, ताकि मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह निरंतर बना रहे।
आचार्यश्री ने संदेश दिया कि मन को जीतने वाला व्यक्ति परिस्थितियों से नहीं हारता। इसलिए बाहरी दुनिया को बदलने से पहले अपने मन को सकारात्मक और शांत बनाने का प्रयास करना चाहिए।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में गुरु भक्त उपस्थित रहे और उन्होंने आचार्यश्री के प्रवचन का लाभ लिया।
— प्रचार-प्रसार संयोजक
नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद








