*सबसे क्षमा सबको क्षमा*

*क्षमा वही व्यक्ति कर सकता है जो अपने अहंकार और क्रोध पर विजय प्राप्त कर सके*
टीकमगढ़। समस्त दिगंबर जैन समाज द्वारा क्षमावाणी पर्व श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। क्षमावाणी पर्व को क्षमा दिवस भी कहा जाता है। यह पर्व आत्मशुद्धि, अहंकार के विसर्जन तथा सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव का संदेश देता है।
धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जनता ने जानकारी देते हुए बताया कि क्षमावाणी पर्व केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और कर्मों की निर्जरा का महत्वपूर्ण अवसर है। जैन दर्शन के अनुसार मन में किसी के प्रति क्रोध, ईर्ष्या अथवा बैर रखने से अशुभ कर्मों का संचय होता है। इस दिन दूसरों को क्षमा करने और अपनी भूलों के लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगने से मन का बोझ हल्का होता है तथा आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। नरेंद्र जनता ने कहा कि कि भगवान महावीर का मूल सिद्धांत अहिंसा है। किसी के प्रति मन में दुर्भावना रखना भी भाव हिंसा का रूप माना गया है। क्षमावाणी के अवसर पर जैन धर्मावलंबी मन, वचन और काया से जाने-अनजाने में किसी को पहुंचाए गए कष्ट के लिए क्षमा मांगते हैं।
जैन परंपरा में क्रोध को आत्मा का स्वभाव नहीं, बल्कि विकार माना गया है। क्षमा मांगने के लिए साहस और विनम्रता की आवश्यकता होती है। इस दिन व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा और उम्र के अहंकार को त्यागकर छोटे-बड़े सभी से क्षमा याचना करता है। इससे आपसी संबंधों में मधुरता और समाज में सौहार्द बढ़ता है।
सभी जीवों से मैत्री का संदेश
क्षमावाणी पर्व की विशेषता यह है कि क्षमा केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि संसार के समस्त जीवों से मांगी जाती है। जैन समाज में इस अवसर पर कहा जाता है—
“खम्मामि सव्व जीवाणं, सव्वे जीवा खमन्तु मे।
मित्ती मे सव्व भूयेसु, वैरं मज्झं ण केणवि॥”
अर्थात—मैं संसार के सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव है और किसी के प्रति मेरा वैरभाव नहीं है।
उन्होंने बताया कि वर्षभर में पारिवारिक जीवन, व्यापार तथा सामाजिक व्यवहार में यदि किसी प्रकार का मनमुटाव या दूरी उत्पन्न हो जाती है, तो क्षमावाणी पर्व उसे समाप्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन लोग एक-दूसरे से “मिच्छामि दुक्कड़म्” कहकर जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं।
क्षमावाणी पर्व समाज को यह संदेश देता है कि क्षमा वीरों का आभूषण है। सच्चे अर्थों में क्षमा वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने अहंकार और क्रोध पर विजय प्राप्त कर सके। यह पर्व आपसी प्रेम, भाईचारे, शांति और विश्व-मैत्री की भावना को मजबूत करने का संदेश देता है।









