ललितपुर : दसलक्षण पर्व के दिनों में किया गया त्याग और उपासना हमें जीवन की सच्ची राह दिखाते हैं। प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म की आराधना की जाती है।क्रोध सभी के लिए अहितकारी है और क्षमा सदा, सर्वत्र सभी के लिए हितकारी होती है। उक्त विचार डॉ सुनील जैन संचय ने दस दिवसीय पर्यूषण महापर्व (दसलक्षण महापर्व) के प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म पर उत्कर्ष समूह , भारत की व्याख्यान माला में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि आचार्यों ने क्रोध को अग्नि की उपमा दी है उसे शांत करने के लिये क्षमा जल ही समर्थ है। जैसे जल का स्वभाव शीतल है वैसे ही आत्मा का स्वभाव शांति है। जैसे अग्नि से संतप्त हुआ जल भी जला देता है वैसे ही क्रोध से संतप्त हुई आत्मा के धर्मरूपी सार जलकर खाक हो जाता है। क्रोध से अंधा हुआ मनुष्य पहले अपने आपको जला लेता है पश्चात् दूसरों को जला सके या नहीं भी।
उत्तम क्षमा धर्म हमारी वैमनस्यता, कलुषता, बैर—दुश्मनी एवं आपस की तमाम प्रकार की टकराहटों को समाप्त कर जीवन में प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, प्यार, आत्मीयता की धारा को बहाने का नाम है। हम अपनी कषायों को छोड़ें, अपने बैरों की गांठों को खोलें, बुराइयों को समाप्त करें, बदलें, प्रतिशोध की भावना को नष्ट करें, नफरत—घृणा, द्वेष बंद करें, आपसी झगड़ों, कलह को छोड़ें।
उक्त व्याख्यान माला दस दिन तक जारी रहेगी।









