आर्यनंदी कॉलोनी में इंद्रध्वज विधान को उत्स्फूर्त प्रतिसाद; शांतिधारा, पादप्रक्षालन व आरती का भक्तिमय आयोजन

छत्रपति संभाजीनगर : आर्यनंदी कॉलोनी, वेदांतनगर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु खंडेलवाल दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री हेमसागरजी महाराज के मंगल सान्निध्य में चल रहे इंद्रध्वज महामंडल विधान से पूरे क्षेत्र में भक्ति, अध्यात्म और धार्मिक उत्साह का वातावरण बना हुआ है। प्रतिष्ठाचार्य अकलंक जैन के मार्गदर्शन में विधान के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धालुओं की उत्स्फूर्त सहभागिता के साथ संपन्न हो रहे हैं। यह जानकारी विधान के मुख्य संयोजक संजय पापड़ीवाल ने दी।
6 सितंबर को भगवान चंद्रप्रभु की शांतिधारा का सौभाग्य हर्षा-प्रवीणकुमार गंगवाल परिवार, जालना को प्राप्त हुआ। वहीं आचार्य श्री हेमसागरजी महाराज के पादप्रक्षालन का सौभाग्य श्रीमती शीला-संजयजी, संदेशजी एवं रितेशजी कासलीवाल परिवार को मिला। सायंकालीन आरती का सौभाग्य श्रीमती अल्का वर्धमानजी कासलीवाल परिवार, मुंबई को प्राप्त हुआ।
विधान के प्रमुख पात्रों में सौधर्म इंद्र दिनेशजी, श्रीमती नीताजी, केतनजी-श्रीमती स्वीटीजी, कुणालजी-श्रीमती निवेदिताजी सेठी परिवार, ईशान इंद्र पूनमचंदजी-श्रीमती जयश्रीजी अग्रवाल, यज्ञनायक इंद्र कुंकुमदेवी-संजयजी, डॉ. अंजली विजय-माधुरी पापड़ीवाल, शांत इंद्र श्रेणिकजी-श्रीमती सुनीताजी-निखिलजी-सोनलजी कासलीवाल, महेंद्र इंद्र शकुंतलादेवी-आनंदजी-श्रीमती क्षमाजी, गीताजी सेठी तथा एक दिवसीय कुबेर इंद्र श्रीमती हेमलतादेवी-संतोषजी-श्रीमती रानोजी सेठी का समावेश है।
विधान के दौरान जलपान, शुद्ध भोजन एवं महाप्रसादी के दाता कांतादेवी-मनीषजी-श्रद्धाजी, मोहनकुमारजी-श्रीमती सुनीताजी तथा पदमजी-पायलजी सोनी परिवार हैं।
विधान में अनेक इंद्र भक्तिभाव से सहभागी होकर धार्मिक अनुष्ठानों में अपना योगदान दे रहे हैं। इनमें हुकुमचंदजी-श्रीमती ज्योतिजी चांदीवाल, संदेशकुमारजी, संजयजी-श्रीमती शीलाजी कासलीवाल, अमितजी-श्रीमती डॉलीजी, ध्रुवी, भूवी अजमेरा, राजेंद्रजी-श्रीमती संगीताजी सेठी, रविजी, नवीनकुमारजी, नितीनकुमारजी, श्रीमती कल्पना बिनायके, राकेशजी-श्रीमती निशाजी, रोचित, श्रीमती प्रिंसी-रौनक बड़जात्या, राहुलजी-श्रीमती प्रियाजी शाह, कांतादेवी-भरतजी-श्रीमती पूजाजी ठोले, शांता, नितीनजी-श्रीमती अन्नुजी, केतनजी-श्रीमती सौम्याजी पाटनी, जितेंद्रजी-श्रीमती मंजूषाजी अजमेरा, अजयजी-श्रीमती अन्नुजी जैन, मोतीलालजी, राजेशजी-श्रीमती वंदनाजी पाटनी, अरुणाजी, सुशीलजी-श्रीमती शर्मीलीजी गंगवाल, पंकजजी-श्रीमती निशीजी पहाड़े, कैलाशचंदजी-श्रीमती तारादेवी, प्रशांतजी-श्रीमती ज्योतिजी, वैभवजी-श्रीमती स्वर्णाजी बिनायके, संजयजी-श्रीमती सारिकाजी पहाड़े, चंपाबाई, अनुपजी-श्रीमती मीनाजी पाटनी, शीतलजी-श्रीमती प्रजक्ताजी, निधिशजी-श्रीमती जैस्मिनजी पाटनी, प्रकाशजी-श्रीमती कल्पनाजी सेठी, शरदजी-श्रीमती निर्मलाजी जैन जालनापुरकर, महावीरजी-श्रीमती सविताजी जैन, श्रीमती सीमाभाभी-अनिल पाटनी, श्रीमती मिताली-अमित-माही, ओमी काला, महावीरजी-श्रीमती मीनाजी, पियुषजी-श्रीमती शीतलजी, निखिलजी-श्रीमती कृतिकाजी सेठी, सुभाषचंद्रजी-श्रीमती पुष्पलताजी बोहरा, नितीनजी-श्रीमती आरतीजी बोहरा, सचिनजी-श्रीमती लीनाजी, अपूर्वजी-श्रीमती आंचलजी बोहरा, नंदलालजी-श्रीमती शकुंतलादेवी, नवीनजी-श्रीमती पूजाजी बोहरा, शैलेंद्रजी-श्रीमती किरणजी सेठी, उमेशजी-श्रीमती आशाजी चूड़ीवाल, संघवीजी-श्रीमती संगीताजी संघवी, श्रीपालजी, सुनीलजी, शिरीषजी, रिशूजी, सिद्धांतजी, वेदांतजी, अविज्ञाजी पाटणी, कासलीवालजी-श्रीमती उषाजी, मीनाजी, विजया कासलीवाल, बबनलालजी-श्रीमती मीनादेवी, लोकेशजी-श्रीमती स्वीटीजी, आगमजी, सर्वार्थजी गोधा, रविंद्रजी-श्रीमती रोशनीजी सेठी सहित अनेक श्रावक-श्राविकाओं की सहभागिता रही।
‘मनुष्य बाहर से हंसता है, लेकिन अंतर्मन में पीड़ा छिपाए रहता है’
इस अवसर पर प्रवचन में आचार्य श्री हेमसागरजी महाराज ने आत्मशुद्धि, प्रामाणिकता और प्रभुभक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “मनुष्य बाहर से कुछ और दिखाई देता है और भीतर से कुछ और होता है। चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन अंतर्मन में अनेक पीड़ाएं वह सहन कर रहा होता है। मनुष्य का बाहरी आचरण और अंतःकरण एक जैसा नहीं होना एक प्रकार की आध्यात्मिक चोरी है। इस चोरी का पश्चाताप मनुष्य को एक न एक दिन करना ही पड़ता है।”
महाराज ने आगे कहा, “मनुष्य मंदिर में जाकर परमात्मा के सामने हाथ जोड़कर कहता है—‘मैं आपका ही हूं’, और घर लौटने के बाद संसार में भी कहता है—‘मैं आपका ही हूं।’ यही द्विधा वृत्ति मनुष्य को अंतर्मुखी होने से दूर रखती है। इसलिए जीवन में संसार के लिए देह, मन, तन और इंद्रियां अवश्य दें; लेकिन अपना निर्मल और पवित्र मन तथा हृदय परमेश्वर के चरणों में अर्पित करें।”
उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान महावीर के सिद्धांतों को केवल मंदिर और धार्मिक आयोजनों तक सीमित न रखते हुए उन्हें अपने जीवन में उतारने का आह्वान किया। आत्मशुद्धि, सत्य, प्रामाणिकता, संयम और प्रभुभक्ति के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का संदेश उन्होंने दिया।
यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल ने दी।









