पुष्पगिरी तीर्थ में वर्षायोग के दौरान गुरु-भक्तों को दिया जीवन परिवर्तन का संदेश; बोले—पूजा सामग्री चढ़ाना आसान, स्वयं को समर्पित करना सबसे कठिन

औरंगाबाद/पुष्पगिरी सोनकच्छ। पत्थर में एक कमी है कि वह पिघलता नहीं, लेकिन उसकी एक खूबी भी है कि वह इंसान की तरह बदलता नहीं है। मनुष्य को अपने जीवन में परिवर्तन के लिए सबसे पहले अपने अहंकार और बुरी आदतों का त्याग करना चाहिए। यह भाव व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ में गुरु-भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
विश्व प्रसिद्ध पुष्पगिरी तीर्थ में परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में आयोजित धार्मिक प्रवचन में आचार्य श्री ने गुरु और प्रभु के प्रति समर्पण का महत्व समझाया।
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि गुरु और प्रभु के चरणों में जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल और अर्घ्य चढ़ाना बहुत आसान कार्य है, लेकिन स्वयं को गुरु और प्रभु के चरणों में समर्पित करना सबसे कठिन है। जो व्यक्ति अपने आपको गुरु और प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, वह भगवान बनने के मार्ग का द्वार खोल लेता है।
उन्होंने कहा कि यदि गुरु और प्रभु के चरणों में वास्तव में कुछ चढ़ाना है तो अपनी बुरी आदतें, पाप, व्यसन, छल-कपट, माया और अहंकार चढ़ाएं। गुरु और प्रभु को अहंकार से बड़ी भेंट और क्या हो सकती है?
अहंकार छोड़ना ही सबसे बड़ी साधना
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य बड़ी आसानी से बाहरी वस्तुएं चढ़ाने को तैयार हो जाता है, लेकिन अपने अहंकार को छोड़ने में उसे सबसे अधिक कठिनाई होती है। सब कुछ अर्पित करने के बाद भी वह अपने अहंकार को नहीं छोड़ पाता। इसलिए एक बार गुरु के चरणों में स्वयं को तिनके की भांति समर्पित करके देखना चाहिए, तब जीवन में मिलने वाले आनंद और शांति का अनुभव स्वयं होगा।
उन्होंने गुरु और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देते हुए कहा कि एक बार गुरु और प्रभु को पूरी समग्रता के साथ जीवन में उतारकर देखिए, जीवन में कितना बड़ा परिवर्तन आता है, इसका अनुभव स्वयं हो जाएगा।
आचार्य श्री ने प्रेरक शब्दों में कहा कि अहंकार के श्रीफल को गुरु और प्रभु के चरणों में पटक-पटक कर फोड़ डालो। इसके बाद जीवन में आने वाले अतिशय और चमत्कार को स्वयं अनुभव करो। सच्ची भक्ति केवल पूजा की सामग्री चढ़ाने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों को छोड़कर स्वयं को बदलने में है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गुरु-भक्तों ने उपस्थित होकर आचार्य श्री के प्रवचन का लाभ लिया।
— जानकारी : प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद

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