ललितपुर : भाद्रमाह की छठ तिथि को दिगंबर जैन समाज के पर्वाधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन होता है। मृदुता का भाव मार्दव कहलाता है । उत्तम मार्दव का अर्थ है सच्ची श्रद्धा से युक्त मृदुता । यह धर्म आत्मा में मान कषाय के अभाव स्वरूप प्रगट होता है । अकसर धन, दौलत, शान और शौकत इन्सान को अहंकारी और अभिमानी बना देता है, ऐसा व्यक्ति दूसरों को छोटा और अपने आप को सर्वोच्च मानता है। ये सभी चीजें नाशवान हैं! ये सभी चीजें एक दिन आप को छोड देंगी या फिर आपको एक दिन मजबूरन इन चीजों को छोड़ना ही पड़ेगा। उक्त विचार डॉ सुनील जैन संचय ने दस दिवसीय पर्यूषण महापर्व (दसलक्षण महापर्व) के द्वितीय दिवस उत्तम मार्दव धर्म पर उत्कर्ष समूह , भारत की व्याख्यान माला में व्यक्त किए।


उन्होंने कहा कि आठ मद शास्त्रों में बताए हैं- ज्ञान का मद,पूजा/प्रतिष्ठा/ऐश्वर्य का मद, कुल का मद, जाति का मद,बल का मद,ऋद्धि का मद,तप का मद और शरीर/रूप का मद, ये आठ मद , मान व्यक्ति को गर्त की ओर ले जाते हैं। जाति आदि मदों के आवेशवश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है। मार्दव का अर्थ है मान का नाश करना। ‘‘मृदु” का भाव मार्दव है, यह मार्दव मानशत्रु का मर्दन करने वाला है, यह आठ प्रकार के मद से रहित है और चार प्रकार की विनय से संयुक्त है।
मान महाविष रूप (हलाहल ज़हर) के समान है तथा नीच गति (नरक,तिर्यंच) का कारण है। कोमलता अर्थात मार्दव अमृत के समान है और उसको धारण करने वाला प्राणी निरंतर सुख ही पाता है।









