जीभ से नहीं, आचरण से बोलता है दिगंबर संत का जीवन : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

पुष्पगिरी तीर्थ में धर्मसभा के दौरान गूंजे प्रेरक विचार; बोले—भौतिकता के दौर में दिगंबर संत बनना बिना दांत के चना चबाने जैसा कठिन औरंगाबाद| पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ

सोनकच्छ। “जीभ से बोले गए शब्दों का सफर केवल कानों तक होता है, लेकिन आचरण और जीवन के मौन शब्दों की यात्रा व्यक्ति के जीवन को ही तीर्थ बना देती है।” यह प्रेरक उद्बोधन व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ पर आयोजित धर्मसभा में गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए दिया।

पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का वर्षायोग पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में आध्यात्मिक वातावरण में चल रहा है। इस दौरान तीर्थ परिसर में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, पूजन-विधान एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।

महावीर के मार्ग पर केवल छोड़ना होता है, ओढ़ना नहीं

धर्मसभा में आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने दिगंबरत्व की महिमा समझाते हुए कहा कि दिगंबर जैन संत अपने उपदेशों से कम और अपने जीवन, तप, त्याग एवं विशुद्ध आचरण से अधिक बोलते हैं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण समाज के लिए संदेश और प्रेरणा बन जाता है।

उन्होंने कहा कि आज भौतिकता, आकर्षण और चकाचौंध से भरी दुनिया में दिगंबर संत बनना अत्यंत कठिन साधना है। यह “बिना दांत के चना चबाने” अथवा “तकिए से कील ठोकने” जैसा कठिन कार्य है। दिगंबरत्व केवल बाहरी स्वरूप नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्ध और सहज अवस्था की साधना है।

आचार्य श्री ने कहा कि दुनिया में सामान्यतः संन्यास का अर्थ एक वेश छोड़कर दूसरा वेश धारण करना माना जाता है, लेकिन भगवान महावीर के मार्ग पर चलने वाले दिगंबर मुनि के लिए संन्यास का अर्थ है—“केवल छोड़ना ही छोड़ना है, ओढ़ना कुछ भी नहीं।”

बाहरी वस्त्र छोड़ना आसान, भीतर के विकार छोड़ना कठिन

आचार्य श्री ने कहा कि त्याग करते-करते जब आत्मा की सहज एवं प्राकृतिक स्थिति प्रकट होती है, वही वास्तविक दिगंबरत्व है। बाहरी वस्त्रों का त्याग अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन मन के भीतर बैठे विकारों, वासनाओं, इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग करना सबसे कठिन साधना है।

उन्होंने कहा, “प्रकृति ने हमें जिस प्राकृतिक रूप में भेजा है, उसी में निर्विकारी भाव से जीवन जीना मुनि धर्म की साधना है। वस्त्रों का त्याग केवल बाहरी परिवर्तन है, जबकि भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करना वास्तविक साधना है। जो अपने भीतर के विकारों और वासनाओं को जीत लेता है, वही सच्चे अर्थों में महावीर के मार्ग पर आगे बढ़ता है।”

धर्मसभा में आचार्य श्री के विचारों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और संयम की प्रेरणा दी। कार्यक्रम के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा।

प्रचार-प्रसार संयोजक : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद

Coming soon
trfgcvkj.blkjhgfd
Picture of रामजी तिवारी मड़ावरा

रामजी तिवारी मड़ावरा

चीफ एडिटर – स्वराज भास्कर

रामजी तिवारी मड़ावरा एक अनुभवी और निष्पक्ष पत्रकार हैं, जो उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की जमीनी खबरों को सटीकता और विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों के अनुभव के साथ, उनका उद्देश्य समाज तक सच्ची, निष्पक्ष और प्रभावशाली खबरें पहुंचाना है।

सबसे ज्यादा पढ़ी गई

Horoscope

Weather

और पढ़ें

राज्य