ललितपुर : बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बाँदा अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र, ललितपुर के केंद्राध्यक्ष डॉ. मुकेश चंद की अध्यक्षता में भा.कृ.अनु.प.-खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर/ भा.कृ.अनु.प.-अटारी, कानपुर और निदेशक प्रसार, बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा से प्राप्त निर्देशानुसार “21वां गाजरघास उन्मूलन जागरूकता सप्ताह (16-22 अगस्त 2026)” के अंतिम दिन 22 अगस्त 2026 को कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। डॉ. दिनेश तिवारी, विषय वस्तु विशेषज्ञ-सस्य/ नोडल अधिकारी-21वां गाजरघास उन्मूलन जागरूकता सप्ताह (16-22 अगस्त 2026) ने तकनीकी जानकारी देते हुए बताया कि गाजरघास जिसे आमतौर पर कांग्रेस घास, सफ़ेद टोपी, गजरी, चटक चांदनी, रुखैया आदि नामों से जाना जाता है, एक विदेशी आक्रामक खरपतवार है। भारत में पहली बार 1950 के दशक में दृष्टिगोचर होने के बाद यह विदेशी खरपतवार रेलवे ट्रैक, सड़को के किनारे, बंजर भूमि, उद्यान आदि सहित लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर फसलीय और गैर फसलीय क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। यह एक वर्षीय शाकीय पौधा है जिसकी लंबाई 1.5 से 2.0 मीटर तक होती है। यह मुख्यतः बीजों से फैलता है। यह एक विपुल बीज उत्पादक है और इसमें लगभग 25000 से 50000 बीज प्रति पौधा पैदा करने की क्षमता होती है। बीज अपने कम वजन के हवा, पानी और मानवीय गतिविधियों द्धारा आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं। गाजरघास को सबसे अधिक खतरनाक खरपतवारों में गिना जाता है क्योंकि वह मनुष्यों और पशुओं में त्वचा रोग (डरमेटाइटिस), अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है। इसके सेवन से पशुओं में अत्यधिक लार और दस्त के साथ मुंह में छाले हो जाते हैं। स्वादहीन होने के कारण इसका उपयोग पशुओं के के चारे के रूप में नहीं किया जा सकता है, साथ ही घास के मैदानों, चरागाहों और बन क्षेत्रों में इसके फैलने से चारे की उपलब्धता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। डॉ. तिवारी ने नियंत्रण के उपाय अंतर्गत बताया कि गाजरघास एक जन मानस की समस्या है, इसलिए इसे नियंत्रित करना के लिए किसानों सहित समाज के सभी वर्गों के द्वारा सामुदायिक पहल कि आवश्यकता है ताकि अपने आसपास को गाजरघास से मुक्त रखा जा सकता है। कृषक बंधु फूल आने से पहली इस खरपतवार को उखाड़कर कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट बना सकते हैं। गाजरघास को विस्थापित करना के लिए चकौड़ा, गेंदा जैसे स्व-स्थाई प्रतिस्पर्धी पौधों की प्रजातियों की बीज का छिड़काव किया जा सकता है। अकृषित क्षेत्रों में सम्पूर्ण वनस्पति नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट (1.0 से 1.5 प्रतिशत) जैसे शाकनाशी का छिड़काव कार सकते हैं और मिश्रित वनस्पति में गाजरघास का नियंत्रण हेतु मैट्रीब्यूजिन (0.3 से 0.5 प्रतिशत) या 2, 4 डी (0.3 से 0.5 प्रतिशत) का छिड़काव उसमें फूल आने से पहले करें, ताकि घास कुल के पौधों को बचाया जा सकें। फसलो में शाकनाशियों के प्रयोग से पहले खरपतवार वैज्ञानिक/ विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य कर लेना चाहिए। जुलाई-आगस्त के दौरान गाजरघास संक्रमित क्षेत्रों में जैविक कीट जाइगोग्रामा बाइकोलोराटा (मेक्सिकन बीटल) को छोड़ा जा सकता है। केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ. मुकेश चंद ने भी सभी प्रतिभागियों को गाजरघास से होने वाले नुकसान और इसके प्रबंधन हेतु जागरूक किया तथा दूसरे कृषक बंधु को अधिक से अधिक इस अभियान में जुड़ने के लिए प्रेरित किया। कृषक बन्धुओं को कृषि विज्ञान केन्द्र, ललितपुर से जुड़कर समय समय पर आवश्यकता अनुसार वैज्ञानिक और तकनीकी जानकारी लेते रहने के लिए भी प्रेरित किया। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान और कृषि विभाग, ललितपुर के अधिकारी/ कर्मचारी जैसे डॉ. अनुज कुमार गौतम, डॉ. सरिता, श्री मनमोहन साहू, श्री ललित कुमार सहित आत्मा योजनान्तर्गत कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम के माध्यम से सभी विकास खंड से आये 60 से अधिक प्रगतिशील कृषक बंधुओं ने प्रतिभाग किया।

जिला ब्यूरो ललितपुर
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