पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ (औरंगाबाद)। “हम अगली पीढ़ी को विरासत में क्या दे रहे हैं—बैंक बैलेंस या बेचैनी? बड़ी-बड़ी इमारतें या बड़े संस्कार? हम पूरी जिंदगी प्लॉट, पैसा, सोना और जायदाद जोड़ने में लगा देते हैं। मन में संतोष रहता है कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं, लेकिन कभी ठहरकर यह भी सोचा है कि उनके भविष्य को संवारने के लिए हम उनके भीतर क्या छोड़ रहे हैं?” ये प्रेरक विचार व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में परम पूज्य तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके पावन सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में आचार्य श्री ने जीवन में संस्कारों, नैतिक मूल्यों, सेवा और भावी पीढ़ी के प्रति हमारी जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला।
संपत्ति से अमीर बन सकता है बच्चा, सुखी नहीं
आचार्य श्री ने कहा कि विरासत का वास्तविक अर्थ केवल संपत्ति का हस्तांतरण नहीं, बल्कि संस्कारों और जीवन-मूल्यों का अगली पीढ़ी तक पहुंचना है। संपत्ति से बच्चा अमीर बन सकता है, लेकिन सुखी बनने के लिए उसे धैर्य, विवेक, परिश्रम और सही निर्णय लेने की क्षमता भी चाहिए। यदि बच्चों को केवल पैसा दिया और धैर्य नहीं सिखाया, तो वे उस संपत्ति का सदुपयोग भी नहीं कर पाएंगे।
उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि बच्चों को केवल मछली देकर उनकी भूख मिटाने के बजाय उन्हें मछली पकड़ना सिखाना चाहिए, ताकि वे जीवनभर आत्मनिर्भर बन सकें। सबसे बड़ी विरासत वह नहीं, जो वसीयत में लिखी जाती है, बल्कि वह है जो माता-पिता के आचरण में दिखाई देती है।
उपदेश से नहीं, हमारे आचरण से सीखते हैं बच्चे
आचार्य श्री ने कहा कि बच्चों के संस्कारों का निर्माण घर के वातावरण और बड़ों के व्यवहार से होता है। माता-पिता मंदिर जाकर भी झूठ बोलते हैं, तो बच्चे उसी व्यवहार से सीखते हैं। इसके विपरीत, यदि वे घर में अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करते हैं, तो बच्चों के भीतर भी सम्मान और विनम्रता के भाव विकसित होते हैं।
उन्होंने कहा कि हम जो जीवन जीते हैं, वही बच्चों के लिए गीता बन जाता है। ऐसे में मोबाइल में व्यस्त रहने वाले माता-पिता बच्चों को पुस्तकों के महत्व और अध्ययन की आदत का पाठ कैसे पढ़ा सकते हैं? बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए सबसे पहले बड़ों को अपने आचरण में बदलाव लाना होगा।
जानकारी बहुत, लेकिन विवेक और दिशा भी जरूरी
वर्तमान पीढ़ी की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि आज बच्चों के पास जानकारी बहुत है, लेकिन ज्ञान और विवेक की कमी दिखाई देती है। गति बहुत है, लेकिन सही दिशा का अभाव है। तकनीक और गूगल से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, परंतु जीवन को सही दिशा देने के लिए गुरु, संस्कार और अनुभव की भी आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चों को केवल स्क्रीन तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें संस्कारों, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्यों से जोड़ें। सफलता प्राप्त करना अच्छी बात है, लेकिन एक अच्छा इंसान बनना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। बच्चों को ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए, जिससे वे अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझें और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
स्कूल, गार्डन और जल सुविधा भी समाज की अमूल्य विरासत
आचार्य श्री ने भविष्य के समाज की नींव मजबूत करने के लिए सेवा कार्यों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमें यह भी विचार करना चाहिए कि 50 वर्ष बाद जब हम इस दुनिया में नहीं होंगे, तब समाज हमें किस रूप में याद करेगा। क्या हमारी पहचान केवल जमीन-जायदाद छोड़ने वालों के रूप में होगी, या ऐसे लोगों के रूप में भी होगी, जिन्होंने समाज को अच्छे विचार, शिक्षा की सुविधाएं, पुस्तकालय, पेड़ और जनकल्याण के कार्य दिए?
उन्होंने पुष्पगिरी में बन रहे स्कूल, गार्डन और पानी की पाइपलाइन जैसे कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि यही वास्तविक सामाजिक विरासत है। ईंट-पत्थर की इमारतें समय के साथ पुरानी हो सकती हैं, लेकिन सद्भावना से किए गए सेवा कार्य पीढ़ियों के जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देते हैं।
संस्कारों से जुड़ता है परिवार, सेवा से बनता है समाज
आचार्य श्री ने संदेश दिया कि जायदाद बांटने से परिवार के हिस्से बन सकते हैं, लेकिन संस्कार बांटने से परिवार पीढ़ियों तक जुड़ा रहता है। धन से घर बनता है, संस्कारों से परिवार और सेवा से समाज का निर्माण होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी विरासत छोड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिस पर आने वाली पीढ़ी गर्व करने के साथ उसे आगे बढ़ाने का संकल्प भी ले।
उन्होंने प्रेरक शब्दों में कहा, “विरासत वह नहीं, जो आप अपने बच्चों के लिए छोड़कर जाते हैं, विरासत वह है, जो आप अपने बच्चों के भीतर छोड़कर जाते हैं।”
संदेश स्पष्ट है—बच्चों के लिए केवल धन-संपत्ति जोड़ना ही पर्याप्त नहीं है। उनके भीतर अच्छे संस्कार, परिश्रम की भावना, बड़ों के प्रति सम्मान, नैतिकता और समाज सेवा का भाव विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। यही वह अमूल्य पूंजी है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचकर परिवार और समाज दोनों का भविष्य संवार सकती है।
उक्त जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।







