“पप्पुओं-टप्पुओं के सनातन विरोधी कृत्य अब भारत सहन नहीं करेगा”

– ब्रह्मर्षि योगीराज श्री भारत भूषण भारतेंदु जी महाराज
पालघर पीठाधीश्वर, महाराष्ट्र
संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है। यदि उसी संसद परिसर में भगवा वस्त्र धारण कर राजनीतिक नाटक किया जाए और करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक मंचन का माध्यम बनाया जाए, तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
समाचारों के अनुसार संसद के मकर द्वार पर विपक्ष के कुछ सांसदों द्वारा भगवा वस्त्र पहनकर राम मंदिर के चढ़ावे के मुद्दे पर सांकेतिक नाटक प्रस्तुत किया गया। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, परंतु किसी भी धार्मिक प्रतीक, संत परंपरा अथवा भगवा वेश की गरिमा को राजनीतिक रंगमंच का उपकरण बनाना उचित नहीं माना जा सकता।
भगवा केवल एक रंग नहीं, बल्कि त्याग, तप, सेवा और राष्ट्रधर्म का प्रतीक है। यह उन ऋषियों, मुनियों, संन्यासियों और बलिदानियों की परंपरा का प्रतीक है जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित किया। यदि इसी भगवा वेश को राजनीतिक अभिनय का पात्र बनाया जाएगा, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएँ स्वाभाविक रूप से आहत होंगी।
मैं सभी राजनीतिक दलों और नेताओं से प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि वर्ष 2020 में पालघर में साधुओं की निर्मम लिंचिंग जैसी पीड़ादायक घटना पर क्या इसी प्रकार का तीव्र प्रतीकात्मक विरोध कभी देखने को मिला? क्या संत समाज के सम्मान के लिए संसद में ऐसा कोई नाटक हुआ? क्या उन निर्दोष संतों के लिए समान संवेदना और संघर्ष दिखाई दिया?
हम किसी भी प्रकार की भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत की निष्पक्ष जाँच के विरोधी नहीं हैं। यदि किसी विषय में आरोप हैं, तो उनकी जाँच कानून के अनुसार होनी चाहिए। किंतु धार्मिक प्रतीकों और सनातन परंपरा का उपहास या राजनीतिक नाट्य मंचन लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है।
मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि सनातन परंपरा, भगवा ध्वज और संत वेश किसी दल की राजनीतिक वेशभूषा नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक पहचान हैं। इनका सम्मान प्रत्येक नागरिक और जनप्रतिनिधि का नैतिक दायित्व है।
मैं संसद में यह सांकेतिक नाटक प्रस्तुत करने वाले सभी सांसदों और पूरी नाट्य मंडली को खुला आमंत्रण देता हूँ कि वे पालघर आएँ। हम उनके लिए मंच की संपूर्ण व्यवस्था करेंगे। वे यहाँ आकर वर्ष 2020 में पालघर में हुई साधुओं की निर्मम लिंचिंग के विरोध में भी एक सांकेतिक नाटक प्रस्तुत करें। इससे देश यह देख सकेगा कि उनका विरोध केवल राजनीति तक सीमित है या वे संत समाज पर हुए अत्याचारों के विरुद्ध भी समान संवेदना और प्रतिबद्धता रखते हैं।
मैं केंद्र सरकार तथा सभी राजनीतिक दलों से आग्रह करता हूँ कि संसद की गरिमा, धार्मिक प्रतीकों की मर्यादा और सामाजिक सौहार्द को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। असहमति व्यक्त कीजिए, प्रश्न उठाइए, जाँच की माँग कीजिए, परंतु राष्ट्र की आध्यात्मिक अस्मिता का राजनीतिक मंचन न कीजिए।
भगवा का सम्मान भारत की आत्मा का सम्मान है।
संतों का सम्मान राष्ट्र का सम्मान है।
सनातन का अपमान किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।j









