ललितपुर। पहलवान गुरुदीन प्रशिक्षण महाविद्यालय एवं सोशल साइंस एंड मैनेजमेंट वेलफेयर एसोसिएशन जबलपुर मध्य प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 13 एवं 14 जून 2026 को “सतत ग्रामीण विकास, कृषि एवं पर्यावरणीय स्थिरता में बहुविषयक अनुसंधान: वैश्विक परिप्रेक्ष्य” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य सतत ग्रामीण विकास, कृषि उन्नयन, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक स्तर पर सतत विकास की चुनौतियों एवं संभावनाओं पर बहुआयामी अकादमिक विमर्श को प्रोत्साहित करना था। सम्मेलन में भारत सहित बांग्लादेश, नेपाल एवं नाइजीरिया के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, विषय विशेषज्ञों एवं विद्यार्थियों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से सहभागिता की। कार्यक्रम में देश-विदेश के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से बड़ी संख्या में शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए तथा समकालीन वैश्विक चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक एवं पहलवान गुरुदीन ग्रुप ऑफ कॉलेज के संस्थापक डॉ. पारसनाथ यादव ने अपने संदेश में कहा कि शिक्षा, अनुसंधान और सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से ही ग्रामीण भारत को सशक्त बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सतत विकास की अवधारणा को व्यवहारिक रूप देने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को समाज और प्रकृति के बीच समन्वय स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभानी होगी। सम्मेलन के संयोजक प्रो. (डॉ.) महेश कुमार झा, प्राचार्य ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि यह सम्मेलन केवल अकादमिक चर्चा का मंच नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज, कृषि क्षेत्र और पर्यावरण से जुड़ी वास्तविक समस्याओं के समाधान खोजने का एक सार्थक प्रयास है।
मुख्य वक्ता एवं बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पूर्व कुलपति प्रो. एनएमपी वर्मा ने कहा कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और सतत ग्रामीण विकास के बिना समग्र राष्ट्रीय विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने शोधार्थियों से समाज की वास्तविक समस्याओं पर आधारित अनुसंधान करने का आह्वान किया तथा कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को ग्रामीण विकास की दिशा में ठोस योगदान देना चाहिए।
पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विषय के प्रख्यात विशेषज्ञ प्रो. डी. के. शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि जलवायु परिवर्तन आज विश्व समुदाय के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जल प्रबंधन, जैव विविधता के संरक्षण तथा पर्यावरण-अनुकूल विकास मॉडल को अपनाने पर बल देते हुए कहा कि पर्यावरणीय स्थिरता के बिना आर्थिक विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक चौबे ने प्रेषित शब्दों में कहा कि ग्रामीण विकास के गांधीवादी सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता के समय थे। उन्होंने स्थानीय संसाधनों के उपयोग, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक सहभागिता को सतत विकास का आधार बताया।
प्रख्यात शिक्षाविद् एवं विचारक प्रो. इन्द्र प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि शिक्षा, अनुसंधान और सामाजिक चेतना को एक साथ जोड़कर ही ग्रामीण समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। उन्होंने युवाओं को नवाचार, अनुसंधान और सामाजिक दायित्व के प्रति सजग रहने का संदेश दिया।
अर्थशास्त्री एवं पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. बिक्रम सिंह ने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए कृषि आधारित उद्योगों, ग्रामीण उद्यमिता तथा स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य तभी साकार होगा जब गांव आर्थिक रूप से मजबूत होंगे।
बांग्लादेश के जगन्नाथ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद जहीर उद्दीन आरिफ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि दक्षिण एशिया के देशों के समक्ष कृषि, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियां समान हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए क्षेत्रीय सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान और संयुक्त शोध की आवश्यकता है।
नाइजीरिया से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ डॉ. प्रिंस डैन म्बाची ने कहा कि सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में शिक्षा, अनुसंधान और सामुदायिक सहभागिता की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने विकासशील देशों के अनुभव साझा करते हुए वैश्विक सहयोग को समय की आवश्यकता बताया।
नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय से डॉ. संजॉय कुमार कर्ण ने कहा कि पर्वतीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकास मॉडल अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कृषि, पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के समन्वित दृष्टिकोण को विकास का प्रभावी माध्यम बताया।
डॉ. संगीता वाशिंगटन ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं डॉ. ममता पाण्डेय ने विज्ञान एवं तकनीकी नवाचारों को कृषि एवं पर्यावरणीय संरक्षण से जोड़ने की आवश्यकता बताई। डॉ. राजीव कुमार निरंजन ने पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देने का आह्वान करते हुए कहा कि भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम के सफल संचालन में संरक्षिका डॉ. पूजा यादव, निदेशक डॉ. अंचल यादव, डॉ. विनोद यादव, आयोजन सचिव डॉ. सुफिया, सह-संयोजक ई. विनय रावत, श्री रक्षपाल सिंह यादव सहित समस्त आयोजन समिति, प्राचार्यों, विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं छात्र-छात्राओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उत्कृष्ट शोध एवं प्रस्तुतीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए बेस्ट रिसर्च पेपर अवार्ड एवं बेस्ट प्रेजेंटेशन अवार्ड प्रदान किए जाने की घोषणा की गई। अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ सम्मेलन का समापन हुआ।
कार्यक्रम का सफल संचालन असि. प्रो. शीवा आफरीन व असि. प्रो. सुरभि झा ने संयुक्त रूप से किया।



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