कोलकाता, [ आज रविवार २८-६-२६ ]

धर्मनगरी कोलकाता में आज रविवार की सुबह अध्यात्म और भक्ति के एक अनूठे संगम की साक्षी बनी। परम पूज्य आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज ससंघ का मंगल पद विहार आज सुबह श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर जी,चौरंगी से प्रारंभ हुआ। मंदिर जी में प्रात:काल प्रभु के परम पावन अभिषेक के उपरांत मुनिसंघ ने आगे के लिए विहार किया।
*भक्तों का उमड़ा जनसैलाब*
आचार्य संघ के इस मंगल विहार में स्थानीय दिगंबर जैन समाज कोलकाता सहित बृहत्तर कोलकाता के विभिन्न कोनों से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तगण जयकारों और भक्ति भजनों के साथ मुनिसंघ की अगवानी कर रहे थे। यह भव्य मंगल विहार शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों जैसे—जीवनदीप, पार्क स्ट्रीट, ईडन गार्डन, आकाशवाणी, स्ट्रैंड रोड और ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज से होते हुए आगे बढ़ा।
बंगवासी जैन मंदिर में भव्य मंगल प्रवेश
मुनिसंघ का भव्य और ऐतिहासिक मंगल प्रवेश श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बंगवासी में हुआ। यहाँ उपस्थित संपूर्ण जैन समाज और भक्तों ने अत्यंत हर्षोल्लास एवं श्रद्धा भाव से आचार्य संघ का पाद प्रक्षालन कर भव्य स्वागत किया। इसके पश्चात, पूज्य आचार्य संघ के पावन सानिध्य में उपस्थित सभी साधर्मी बंधुओं ने बड़े ही भक्ति भाव से प्रभु का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न कर विश्व शांति की कामना की।
आत्मा में आनंद कब आता है? – आचार्य श्री की अमृत देशना
इस पावन अवसर पर पूज्य मुनिराज श्री वसुनंदी जी महाराज ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए एक बेहद मार्मिक और सुंदर सीख दी। उन्होंने प्रकृति के उदाहरणों से जीवन का मर्म समझाते हुए कहा:
“जैसे सूर्य उदित होने पर स्वयं अपनी तारीफ करने नहीं आता, बल्कि उसकी किरणें अपने आप चारों ओर प्रकाश फैला देती हैं। जैसे फूल खिलने पर घर-घर जाकर अपनी बड़ाई नहीं करता, बल्कि उसकी महक स्वतः ही हर किसी के मन को तृप्त कर देती है। ठीक इसी तरह, जब किसी व्यक्ति की आत्मा में सच्चा आनंद आता है, तो उसके जीवन में संयम अपने आप आ जाता है।”
आचार्य श्री ने आगे प्रेरणा देते हुए कहा कि आत्मा का आनंद जागृत होते ही सारे वस्त्र, अस्त्र और शस्त्र (सांसारिक वस्तुएं, वासनाएं और अहंकार) अपने आप छूट जाते हैं। बिना संयम और त्याग के कभी भी आत्मिक सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। सच्चा आनंद बाहर की भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर के संयम और संतोष में समाहित है।








