टीकमगढ़ शहर के बाज़ार जैन मंदिर में प्राकृत भाषा शिक्षण शिविर का शुभारंभ बड़े उत्साह और आध्यात्मिक माहौल में किया गया।

धर्म प्रभावना समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जनता ने जानकारी देते हुए बताया कि प्राकृत भाषा का अध्ययन केवल एक कोर्स नहीं, बल्कि सनातन एवं श्रमण संस्कृति की जड़ों को समझने की कुंजी है।
प्राचीन आगम, शिलालेख तथा भारतीय दर्शन की गहराई प्राकृत भाषा में सुरक्षित है। अपनी मूल भाषाओं को जीवित रखना ही हमारी सांस्कृतिक विरासत का वास्तविक सम्मान है।
प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि शिक्षण शिविर
दिनांक : 2 मई से 10 मई
बाज़ार जैन मंदिर, टीकमगढ़
इस शिविर में विशेष रूप से:
प्राकृत भाषा का व्यावहारिक और शास्त्रीय अध्ययन
ब्राह्मी लिपि के लेखन-पठन का प्रशिक्षण
प्राचीन शास्त्रों और अभिलेखों को पढ़ने की क्षमता का विकास
शिविर की महत्ता
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
प्राकृत भाषा केवल एक बोली नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन जीवनशैली, आध्यात्मिकता और सिद्धांतों का मूलाधार है। इसे सीखना अपने इतिहास से जुड़ने का माध्यम है।
ब्राह्मी लिपि का ज्ञान
ब्राह्मी लिपि वह जननी लिपि है, जिससे देवनागरी सहित अनेक भारतीय लिपियों का जन्म हुआ। इसका अध्ययन हमारे इतिहास के अनकहे पन्नों को खोल देता है।
बौद्धिक विकास
प्राचीन पांडुलिपियों, शिलालेखों और आगम साहित्य को मूल रूप में पढ़ने की क्षमता विकसित होती है, जिससे ज्ञान का दायरा अत्यंत विस्तृत होता है।
इस कार्यक्रम द्वारा प्रशिक्षण कराया जा रहा है
▶️पत्रकार रामजी तिवारी मड़ावरा
▶️संपादक स्वराज भास्कर
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▶️9455422423,9695121690








